देख लो दर्पण, क्यों हार गए न हम
हो स्वार्थ सर्वोपरि, तो जलना है वतन
धर्म बना बोझ, भर चुका है अहम्
किस किस को कोसे, सब तो हैं दुश्मन
वोटों की गिनती में भूले अपना कर्म,
अपनों को लूटने में नेता हैँ मगन
जो बदलेगी सरकार, तो बदलेगा बर्तन
पर तरक्की के नाम पर फिर मिलेगा कफ़न
पुतलों को जलते देखा है, काश नेता होते दहन
पापियों का ये घडा, कब भरेगा भगवन
आतंक भूले, षडयंत्र भूले, भूल गए शहीदों के यतन
ये नरमी पड़ रही भारी, क्यों हार गए न हम
सहेंगे, न कहेंगे, गर कहा तो कुछ न करेंगे हम
बरतेंगे संयम, क्यो हार गए न हम!!!
-अमित

2 comments:
written by my better half(?) surely this heartfelt moved me...
Hope you all enjoy this
Bahut umda likha hain, aur ek dum dil se likha hain.
Keep writing guys :-)
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